Ishara

                ...."Ishara"....
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झमाझम बारिश हो रही थी! मै बालकनी मे बैठा था! एक हाथ में पूरी कप भारी चाय और दूसरे में एक आधी जली हुई गोल्ड फ्लैक सिगरेट ,ये वो सिगरेट थी जो दिन में चौथी बार जलायी जा रही थी, उसकी के इंतज़ार में!

सामने की बालकनी में मानो हलचल हो रही थी! शायद उसको भी पता चल चुका है के मै आगया हु!

पिंक शुट और उसपे आसमानी कालर कढ़ाई किया हुआ दुपट्टा जो उसने कमर में बाँध रखी है!
एक काग़ज़ की नाव लेके छत पे आ चुकी है! और तो और उसके साथ तो चिंटू मिंटू भी गए है,
हम इशारो में ही अपना प्यार व्यक्त करने लगे!
मगर वो तो मुझे ऐसे घुर रही थी, जैसे में उसका जानी दुश्मन का कन्या उठाने वाला में ही था,
अपनी नाव वो धीरे से तैरा रही है और इधर मानो मेरा नाव  डूबती जा रही थी!
अचानक  युही मुड़ी ,
मैने झट से सिगरेट बुझा के दीवार के बग़ल फेंक दी !

वो हमें एक टक  को देख रही है! मैं उसे को टकटकी लगाते हुए निहार रहा हु! इशारो में,
शरमाते हुए मानो मेरे सारे इश्क़ का भूत उत्तर गया उसके घूरने का अंदाज़ देखर!
अचानक बारिश तेज़ होने लगी पानी उस पे पर रही थी और भीग में रहा था!
उसकी ममी बुला रही थी! पर वो आवाज को अनसुना कर के ताड़ती जा रही थी, में कहा कम था शक्तिमान का नाम लेकर थोड़ा हिम्ड़मत जुटाया और मैने भी उसकी तरफ कुछ इशारा किया... वो समझ नही पा रही थी!


फिर में हाथ दिखा के इशारा कर रहा था.. वो मुसकियायी जा रही थी!
उसकी टूटी हुई दांत नज़र आरही थी,पर उसे पता नही चल रहा था!
अचानक एक(हवा में उड़ती हुई एक चप्पल लड़की की पीठ पे लगती है और मम्मी की आवाज़ आती है.. "बहरी हो गयी है रे का?) उसकि ममी के आते ही मैंने ने नज़र फेर ली थी!
और उसकी नटखटी मासूमियत खोने वाला ही था,
जोर से मेरे पीठ पे एक बेलन गिरी''' माँ माँ....





   लेखक----प्रिंस कुमार *(इशारा)

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