Khamoshiyan
....Khamoshiyan....
-------------------------------------------------------------------
एक नदी थी दोनों किनारे
थाम के बैठी थी
एक नदी थी…!
आजाद थी जब
झरनों की तरह
चट्टानों को चीर के
बहती थी...
आजाद थी जब
साहिलों को छु
जाती थी....
एक नदी थी,
दोनों किनारों को थाम के
बहती थी...
साथ साथ
चलते तो थे
पर एक हो सकते नहीं थे ...
मैं नदी का
एक किनारा था,
और वो दूसरा किनारा थी !
दोनो एक ही धुन में ..
बहते थे,
लेकिन शैलाब बनकर..
एक नदी थी..
दोनों किनारों को थाम
कर बैठी थीं..!
करवट लेती तो
ज़मीं दरकती
बांध तोड़ती तो
सैलाब लाती...
दोनों किनारे थाम के बैठी थी
एक नदी थी ...!
और... कहने को तो दोनो किनारे
एक नदी के ही हैं पर सोचो ....
तो, ना वो इस किनारे की,
ना उस किनारे की....!
प्रिंस कुमार




Comments